गांधी चौराहे पर कांग्रेस का विरोध या संगठन की पोल? मंच सजा, नेता नदारद और सवालों में आंदोलन!

SHARE:

प्रतापगढ. शहर गांधी चौराहे पर रविवार को कांग्रेस ने मनरेगा का नाम बदलने के विरोध में प्रदर्शन रखा। मंच सजा, नारे लगे, बयान दिए गए… लेकिन ज़रा ठहरिए, अगर इसे विरोध प्रदर्शन कहा जाए तो शायद शब्दों के साथ अन्याय होगा। क्योंकि ज़मीनी हकीकत में यह प्रदर्शन कम और कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी का सार्वजनिक प्रदर्शन ज़्यादा नजर आया। सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि जिन चेहरों के नाम पर कांग्रेस खुद को मजबूत संगठन बताती है, वे चेहरे आखिर थे कहां?
जिला अध्यक्ष भानुप्रताप सिंह, महिला कांग्रेस की जिला अध्यक्ष नेहा शर्मा, पूर्व विधायक रामलाल मीणा, पूर्व जिला प्रमुख इंदिरा देवी मीणा जैसे दिग्गज नेताओं की गैरमौजूदगी ने पूरे कार्यक्रम को प्रतीकात्मक विरोध में बदल दिया। कार्यकर्ता नारे लगाते रहे और बड़े नेता शायद कैलेंडर में तारीख ढूंढते रह गए।

कांग्रेस का दावा था कि यह केंद्र सरकार के  गरीब विरोधी फैसले के खिलाफ जोरदार आंदोलन है, लेकिन तस्वीर यह बनी कि कांग्रेस पहले अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने में असफल रही। गांधी के नाम की रक्षा का दावा करने वाली पार्टी खुद गांधी चौराहे पर एकजुट नहीं दिखी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि प्रतापगढ़ कांग्रेस इस समय दो गुटों में बंटी हुई है। एक गुट विरोध प्रदर्शन करता है, दूसरा शायद उसी विरोध से विरोध करता है। नतीजा यह कि आंदोलन सड़क पर कम और संगठन के भीतर ज़्यादा उलझा हुआ दिखाई दिया। कार्यकर्ताओं में भी यह सवाल तैरता रहा कि जब नेतृत्व ही नदारद हो, जब बड़े पदाधिकारी साथ खड़े न हों,  तो फिर यह विरोध किसके दम पर और किसके लिए? कुल मिलाकर, गांधी चौराहे पर कांग्रेस का यह प्रदर्शन सरकार के खिलाफ संदेश देने से ज्यादा अपनी संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी का आईना बन गया। मनरेगा के नाम पर विरोध था, लेकिन असल में यह साफ दिखा कि प्रतापगढ़ कांग्रेस में फिलहाल एकता ही सबसे बड़ी गारंटी से बाहर है।
बाइट- कोंगेसजन

Leave a Comment

error: Content is protected !!