अफीम की खेती बनी किसानों की उम्मीद, लेकिन संकट भी गहराया
प्रतापगढ़। जिले में अफीम की खेती को यूं ही ‘काला सोना’ नहीं कहा जाता। यह फसल हजारों किसानों की आजीविका और जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। इस वर्ष अफीम की खेती का रकबा और किसानों की संख्या दोनों बढ़े हैं। खेतों में फसल हरी-भरी नजर आ रही है, लेकिन इसके साथ ही किसानों की परेशानियां भी बढ़ती जा रही हैं।
अफीम की खेती का बढ़ा दायरा, आंकड़े दे रहे गवाही
इस वर्ष प्रतापगढ़ जिले के 273 गांवों में 9,641 किसानों ने अफीम की खेती की है। कुल 851.600 हैक्टेयर क्षेत्र में अफीम की बुवाई की गई है। वर्तमान में फसल अच्छी बढ़वार पर है और किसान निराई-गुड़ाई में जुटे हुए हैं।
नारकोटिक्स विभाग की ओर से वर्ष 2025–26 के लिए सभी किसानों को विधिवत लाइसेंस जारी किए गए हैं।

विभागीय निगरानी में अफीम की खेती
जिला अफीम अधिकारी एच.एल. वर्मा के अनुसार, इस वर्ष अफीम की खेती के लिए 18 टीमें गठित की गई हैं। ये टीमें खेतों पर जाकर पैमाइश का कार्य कर रही हैं। सभी लाइसेंस संबंधी आंकड़े मुख्यालय को भेजे जा चुके हैं।
यदि पिछले वर्ष से तुलना की जाए, तो अफीम की खेती करने वाले किसानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
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मौसम बना अफीम की खेती का सबसे बड़ा दुश्मन
हालांकि फसल देखने में अच्छी है, लेकिन किसानों का कहना है कि मौसम ने उन्हें परेशान कर दिया है। सुबह की घनी धुंध और अत्यधिक ओस के कारण पौधों की पत्तियां गीली रहती हैं। इससे फसल में पीलापन आ रहा है और बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
इसी कारण किसानों को हर 8 से 10 दिन में महंगे स्प्रे कराने पड़ रहे हैं, जिससे लागत लगातार बढ़ रही है।
👉 अफीम खेती संबंधी नियमों के लिए नारकोटिक्स विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

बढ़ती लागत ने तोड़ी किसानों की कमर
अफीम की खेती में एक स्प्रे पर 4 से 5 हजार रुपये तक खर्च आ रहा है। कई किसानों को हर पिलाव में दो-दो बार दवा छिड़कनी पड़ रही है। बारिश के बाद खेतों में पानी भरने से कई बार बीज दोबारा डालने पड़े, जिससे पौधे कमजोर हो गए।
बार-बार सिंचाई और दवा के कारण खेती अब बेहद महंगी होती जा रही है।
अफीम की खेती पर नीलगाय और तोतों का खतरा
फसल की सुरक्षा किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। जिले के कई क्षेत्रों में नीलगायों का आतंक बढ़ गया है। जाली लगाने के बावजूद नीलगाय खेतों में घुसकर फसल को नुकसान पहुंचा रही हैं।
जैसे-जैसे डोड़े बनने लगते हैं, वैसे-वैसे तोतों का खतरा भी बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए किसानों को अतिरिक्त इंतजाम करने पड़ते हैं।

चोरी का डर और मानसिक तनाव
डोड़े बनने के समय चोरी की घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। किसान रात-दिन खेतों में रखवाली करने को मजबूर हैं। अफीम की खेती से जुड़े किसान बताते हैं कि बढ़ती लागत, मौसम की मार और सुरक्षा की चिंता ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान कर दिया है।
