सीतामाता अभयारण्य जैव विविधता, पौराणिक आस्था और पर्यटन की अपार संभावनाओं से भरपूर है, लेकिन अब भी राष्ट्रीय पहचान का इंतजार कर रहा है।
जैव विविधता और आस्था का केंद्र सीतामाता अभयारण्य, राष्ट्रीय पहचान की राह देखता पर्यटन स्थल
प्रतापगढ़. सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य राजस्थान का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां प्रकृति, जैव विविधता और पौराणिक आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह अभयारण्य न केवल प्रतापगढ़ जिले की पहचान है, बल्कि प्रदेश स्तर पर भी इसे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
सीतामाता अभयारण्य की भौगोलिक और प्राकृतिक विशेषताएं
सीतामाता अभयारण्य 423 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह अरावली, विंध्याचल और मालवा पठार के संगम क्षेत्र में स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 280 से 600 मीटर के बीच है।
यहां एवरग्रीन, सेमी-एवरग्रीन और पतझड़ वन पाए जाते हैं। औसत वार्षिक वर्षा 756 मिमी रहती है।

वन्यजीव और जैव विविधता की भरमार
अभयारण्य में 50 से अधिक स्तनधारी प्रजातियां और 325 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं।
इसी दौरान यहां पैंथर, चौसिंगा, पैंगोलिन, सियार, लोमड़ी और दुर्लभ उड़न गिलहरी देखने को मिलती है।
उड़न गिलहरी को स्थानीय लोग “सीतामाता की परी” कहते हैं। इसे सूर्यास्त के समय महुआ के पेड़ों पर उड़ते देखा जा सकता है।

दुर्लभ वनस्पतियां और जड़ी-बूटियां
यहां करीब 800 प्रकार के पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
इसके अलावा 330 से अधिक जड़ी-बूटियों की पहचान हो चुकी है।
हालांकि 33 दुर्लभ औषधीय पौधे केवल इसी क्षेत्र में पाए जाते हैं, जो इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

जाखम बांध और नदियों का महत्व
सीतामाता अभयारण्य में स्थित जाखम बांध प्रतापगढ़ जिले की जीवन रेखा है।
इसके बाद नांगलिया बांध और नहर प्रणाली विकसित की गई है।
वहीं, जाखम, सीतामाता और टांकियां जैसी नदियां पूरे वर्ष बहती हैं।
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पौराणिक आस्था से जुड़ा सीतामाता मंदिर
मान्यता है कि त्रेता युग में माता सीता ने यहां वनवास बिताया था।
महर्षि वाल्मीकि का आश्रम, लव-कुश बाग और सीता बाड़ी इसी क्षेत्र में स्थित हैं।
यहां प्रतिवर्ष ज्येष्ठ अमावस्या पर विशाल मेला आयोजित होता है।

पर्यटन सुविधाएं और संभावनाएं
वन विभाग द्वारा पूंगातालाब क्षेत्र में ट्री-हट बनाए गए हैं।
पर्यटक यहां रात में ठहरकर जंगल की शांति का अनुभव कर सकते हैं।
हालांकि सड़क और परिवहन सुविधाओं की कमी के कारण अभी पर्यटकों की संख्या सीमित है।
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राष्ट्रीय पहचान की जरूरत क्यों?
वर्तमान में यहां सालाना करीब 15 हजार पर्यटक आते हैं।
विदेशी पर्यटकों की संख्या सौ से भी कम है।
यदि सरकार, वन विभाग और जनप्रतिनिधि मिलकर प्रचार और आधारभूत सुविधाएं बढ़ाएं, तो यह क्षेत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर उभर सकता है।
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