प्रतापगढ़. बेहतर मजदूरी और सम्मानजनक जीवन की तलाश में घर से निकले आदिवासी मजदूरों को क्या पता था कि इंदौर का सपना उन्हें महाराष्ट्र के गन्ने के खेतों में बंधुआ बना देगा। भूख, मारपीट, डर और अपमान के बीच जीते इन मजदूरों की जिंदगी ‘ऑपरेशन विश्वास’ से ही बच सकी।घर की गरीबी, बच्चों का भविष्य और दो वक्त की रोटी का सपना—यही मजबूरी थी, जिसने प्रतापगढ़ जिले के आदिवासी महिला-पुरुषों को अपने गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। दलालों ने इंदौर में अच्छी मजदूरी, रहने-खाने की सुविधा और सम्मानजनक जीवन का भरोसा दिया। भरोसा इतना मजबूत था कि किसी ने सवाल नहीं किया, किसी ने शर्त नहीं रखी। लेकिन यह सफर मजदूरी का नहीं, बल्कि कैद का था। मजदूरों को महाराष्ट्र के शोलापुर जिले के गन्ने के खेतों में पहुंचते ही सच्चाई का अहसास हुआ। वहां न मजदूरी थी, न इंसानियत। सूरज निकलने से पहले खेतों में उतार दिया जाता और देर रात तक गन्ना कटवाया जाता। न तय समय, न पूरा भोजन। थके शरीर और भूखे पेट के साथ काम करना उनकी रोजमर्रा की मजबूरी बन गया।
महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार, मजदूरी मांगने पर लाठियों से मारपीट और भागने की कोशिश करने वालों को बाड़ों और फार्म हाउसों में बंद कर देना आम बात थी। बच्चों के सामने माता-पिता पिटते रहे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं उठा सका। डर इतना था कि मजदूर कहते थे—“अगर मर गए तो कोई पूछने वाला नहीं।”
महिला मजदूर रिचा की आंखों में आज भी वह डर जिंदा है। वह बताती है कि कई-कई दिनों तक पेट भर खाना नहीं मिलता था। विरोध करने पर गाली-गलौज और मारपीट होती थी। रात में भाग न जाएं, इसलिए अंदर से ताले लगा दिए जाते थे। वहीं मजदूर जीवन का कहना है कि खेत मालिक कहते थे—“मर जाओ तो मशीन से मिट्टी में दबा देंगे।” यह सुनकर भी उन्हें काम करना पड़ता था।
दो महीने तक लगातार अमानवीय हालात में काम कराने के बावजूद मजदूरों को एक रुपया तक नहीं मिला। डर, भूख और अपमान के साए में जी रहे ये लोग खुद को भूल चुके थे—बस जिंदा रहना ही उनकी सबसे बड़ी लड़ाई थी।
इसी अंधेरे में ‘ऑपरेशन विश्वास’ उम्मीद की किरण बनकर आया। सूचना मिलते ही प्रतापगढ़ पुलिस ने जोखिम उठाकर इन मजदूरों को उस नरक से बाहर निकाला। जब रेस्क्यू हुआ, तब न उनके पास खाना था, न घर लौटने के पैसे—सिर्फ थकी हुई आंखें और टूटे हुए सपने थे।
देर रात करीब 11:30 बजे प्रतापगढ़ लाए गए सभी 53 मजदूरों को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। जिला पुलिस अधीक्षक बी. आदित्य ने बताया कि महाराष्ट्र के शोलापुर जिले से 13 महिलाओं और 40 पुरुषों को सुरक्षित रेस्क्यू किया गया है। इस मामले में महाराष्ट्र के सीताराम पाटिल और राजस्थान के अलवर निवासी खान नामक दलालों की भूमिका सामने आई है। थाना घण्टाली में मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी से संबंधित प्रकरण दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
एसपी बी. आदित्य ने कहा—“प्रतापगढ़ पुलिस का लक्ष्य है आमजन में विश्वास और अपराधियों में भय, और ऐसे अमानवीय अपराधों पर आगे भी कठोर कार्रवाई जारी रहेगी।”
