पीपलखूंट पूर्ण शिला महादेव धाम महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आस्था और रोमांच का अनूठा संगम बन गया है। घने जंगल, पथरीली चढ़ाई और रहस्यमयी शांति के बीच स्थित यह स्थल प्रतापगढ़ जिले की आध्यात्मिक धरोहर के रूप में पहचान बना चुका है। स्वयंभू शिवलिंग, शेषनाग शिला और पांडवों की पदचिह्न यहां की विशेष पहचान हैं।
पांडवों की पदचिह्न और लोकविश्वास की गाथा
राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में नेशनल हाईवे-56 के समीप स्थित पीपलखूंट का वन क्षेत्र रहस्यों से भरा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहीं बिताया था। पत्थरों पर उकेरे गए निशानों को ग्रामीण आज भी पांडवों की पदचिह्न मानते हैं।
यहां की हर पगडंडी लोककथाओं और आस्था से जुड़ी कहानी सुनाती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
पूर्ण शिला महादेव और शेषनाग शिला का आकर्षण
कठिन चढ़ाई के बाद स्थित पूर्ण शिला महादेव मंदिर आस्था का केंद्र है। बताया जाता है कि लगभग 39 वर्ष पूर्व यहां स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। इसकी बनावट उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम के शिवलिंग से मिलती-जुलती मानी जाती है।
इस स्थल की विशेष पहचान शेषनाग के आकार में दिखाई देने वाला प्राकृतिक शिलाखंड है, जिसे श्रद्धालु दिव्य प्रतीक मानते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां विशेष पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।
पाँच शताब्दी पुराना किला और रहस्यमयी ध्वनियां
पूर्ण शिला महादेव तक पहुंचने से पहले श्रद्धालु ‘बाबाजी की धूनी’ पर रुकते हैं, जहां तप और साधना की परंपरा जीवित है। ऊंचाई पर स्थित मौलक माता और हनुमान मंदिर लगभग पाँच शताब्दी पुराने बताए जाते हैं। समीप ही प्राचीन किले के खंडहर मौजूद हैं, जिनका कोई लिखित इतिहास नहीं, लेकिन लोककथाएं आज भी उनकी गाथा सुनाती हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, कभी-कभी यहां रहस्यमयी ध्वनियां सुनाई देती हैं। वहीं वन विभाग ने क्षेत्र में पैंथर सहित जंगली जानवरों की आवाजाही को देखते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर पीपलखूंट पूर्ण शिला महादेव धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और लोकविश्वास का जीवंत संगम बनकर उभरता है।
यह खबर भी पढ़े : प्रतापगढ़ महाशिवरात्रि मेला, उमड़ी भक्तों की भीड़
